Sep 8, 2018

हकीकत जानने को दांव पर लगा दिए 50 लाख, गलती परीक्षा संस्था की और कीमत परीक्षार्थी चुका रहे, 2500 परीक्षार्थियों ने खर्च किए दो-दो हजार

हकीकत जानने को दांव पर लगा दिए 50 लाख, गलती परीक्षा संस्था की और कीमत परीक्षार्थी चुका रहे, 2500 परीक्षार्थियों ने खर्च किए दो-दो हजार

अंकों के गोलमाल पर ही बदली थी परीक्षा संस्था

■ गलती परीक्षा संस्था की और उसकी बड़ी कीमत परीक्षार्थी चुका रहे

2500 परीक्षार्थियों ने उत्तर पुस्तिका पाने को खर्च किए दो-दो हजार

■ सामान्य-ओबीसी 600, एससी-एसटी 400 रुपये दे चुके थे परीक्षा शुल्क

इलाहाबाद : अजीब संयोग है कि परीक्षा नियामक प्राधिकारी कार्यालय उप्र को शिक्षक भर्ती व अन्य परीक्षाएं जिस वजह से मिलीं, अंकों का वही गोलमाल फिर सामने आया है। परीक्षा में अंकों की हेराफेरी सामने आने से सात साल पहले की तरह कार्रवाई भी होने जा रही है। इसमें कई अफसर मुख्यमंत्री कार्यालय के निशाने पर हैं।


प्रदेश में पहली शिक्षक पात्रता परीक्षा बसपा शासनकाल 2011 में हुई थी। ये इम्तिहान का जिम्मा यूपी बोर्ड जैसी संस्था को दिया, ताकि परीक्षा बेहतर तरीके से कराई जाए। परिणाम आने के बाद अंकों का गोलमाल होने की एक नहीं कई मामले लगातार सामने आए। संस्था के अफसर व कर्मचारियों से मिलकर जालसाजों ने टेबुलेशन रिकॉर्ड तक में हेराफेरी कराई। ज्ञात हो कि टीईटी 2011 में 11 लाख 53 हजार 155 अभ्यर्थियों ने पंजीकरण कराया, 11 लाख 21 हजार 310 परीक्षा में शामिल हुए, उनमें से पांच लाख 72 हजार 499 परीक्षा उत्तीर्ण किया।


इस परीक्षा में अब तक के रिकॉर्ड में सर्वाधिक अभ्यर्थी बैठे और सफलता प्रतिशत सबसे अधिक रहा। पुलिस जांच में भ्रष्टाचार खुला तत्कालीन माध्यमिक शिक्षा निदेशक संजय मोहन गिरफ्तार हुए। खास बात यह है कि जिस तरह शिक्षक भर्ती की लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद 68500 भर्ती में अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिलनी थी, उसी तरह टीईटी 2011 उत्तीर्ण करने के बाद 72825 शिक्षक भर्ती में नियुक्ति होनी थी। इसीलिए परीक्षा परिणाम को दुरुस्त कराने को परीक्षा की शुचिता तार-तार कर दी गई। पहली टीईटी परीक्षा में भ्रष्टाचार के कारण अगले वर्ष 2012 में ये इम्तिहान नहीं कराया जा सका।


इलाहाबाद : गलती परीक्षा संस्था की और उसकी बड़ी कीमत परीक्षार्थी चुका रहे हैं। सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा 2018 का कुछ ऐसा ही फलसफा है। परीक्षा परिणाम से सहमत न होने वाले 2500 परीक्षार्थियों ने किसी तरह से धन का प्रबंध करके 50 लाख रुपये अपनी उत्तर पुस्तिका पाने के लिए खर्च कर दिए हैं। परीक्षा शुल्क से कई गुना अधिक धन उन्होंने रिजल्ट की हकीकत जानने के लिए मजबूरन खर्च किया है। इसके बाद भी उन्हें कॉपी देखने के लिए एक माह का इंतजार करने को कहा गया है।

परिषदीय स्कूलों में सहायक अध्यापक बनने के लिए प्रदेश के सवा लाख अभ्यर्थियों ने दावेदारी की। इसके लिए सामान्य व पिछड़ा वर्ग के प्रति अभ्यर्थी ने 600 रुपये और अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थियों ने 400 रुपये प्रति छात्र परीक्षा शुल्क दिया। 27 मई को इम्तिहान हुआ और 13 अगस्त को जारी रिजल्ट में महज 41556 अभ्यर्थी उत्तीर्ण हो सके।


परिणाम आने के दिन ही तमाम अभ्यर्थियों ने मूल्यांकन पर सवाल खड़े किए। उस समय बताया गया कि कॉपी दोबारा जांचने का प्रावधान ही नहीं है। विरोध बढ़ने पर बताया गया कि शासनादेश में प्रावधान किया गया है कि स्कैन कॉपी उसी परीक्षार्थी को मिलेगी, जो दो हजार रुपये प्रति छात्र परीक्षा नियामक प्राधिकारी सचिव कार्यालय में डिमांड ड्राफ्ट जमा करेगा। ये आदेश ‘दैनिक जागरण’ के जरिए सार्वजनिक होते ही बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने दावेदारी शुरू की।


चंद दिनों में ही सैकड़ों आवेदन जमा हुए। यही नहीं, कॉपी देखने की इतनी बड़ी धनराशि इसलिए तय की गई थी कि कम से कम अभ्यर्थी आवेदन करें लेकिन, परिणाम इस तरह का रहा कि स्कैन कॉपी लेने के लिए होड़ मच गई।

हाईकोर्ट के आदेश वाले प्रकरण खुले : अब तक उत्तर पुस्तिकाओं में अंकों के गोलमाल के जो मामले सामने आए हैं, वे सभी अभ्यर्थी हाईकोर्ट की शरण लेने वाले हैं। इसके बाद सामान्य अभ्यर्थियों को कॉपी इस माह के दूसरे पखवारे से मिलना शुरू होंगी। उसके बाद और बड़े मामले सामने आ सकते हैं।

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