सरकारी स्कूल, जहां दाखिले के लिए आती हैं सिफारिशें

सरकारी स्कूल, जहां दाखिले के लिए आती हैं सिफारिशें
sarkari school, jahan dakhile ke liye aati hain sifarishen

बलरामपुर, परिषदीय विद्यालयों में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए अफसर से लेकर जनप्रतिनिधि तक एड़ी से चोटी तक का जोर लगाने के बाद भी स्कूलों में बच्चों की संख्या नहीं बढ़ा पा रहे हैं। वही सदर शिक्षा क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय द्वितीय में दाखिला कराने के लिए अभिभावकों को जनप्रतिनिधियों से लेकर अफसरों तक से सिफारिशें करानी पड़ती हैं। बावजूद इसके बच्चों का दाखिला नहीं हो पाता है। बच्चों को संस्कार के साथ पर्यावरण, जलसंरक्षण व स्वच्छता की सीख दी जाती है।

ऐसे बदली सूरत 1वर्ष 2013 में प्रधानाध्यापक अनीता कुशवाहा की तैनाती हुई। उस समय विद्यालय में महज 129 छात्र नामांकित थे, लेकिन 70 से 90 बच्चों की उपस्थिति रहती थी। दो शिक्षामित्रों की तैनाती थी। उनका भी समायोजन हो गया, जिससे वह अकेले हो गईं। घर-घर जाकर अभिभावकों को जागरूक किया। बच्चों की संख्या बढ़कर 310 हो गई। इसके बाद सहायक अध्यापिका निहारिका सिंह, सौम्या सिंह, प्रज्ञा गोस्वामी व यास्मीन परवीन की तैनाती हुई। वर्ष 2014 में स्कूल को मॉडल स्कूल का दर्जा मिल गया। प्रोजेक्टर, बोर्ड, माइक, शौचालय, खिलौने, झूले व वाश बेसिन टंकी, रंग-रोगन कराया। बच्चों को बैठने के लिए कारपेट बिछवाया। 2016 में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उत्कृष्ट विद्यालय के पुरस्कार से पुरस्कृत किया। आज तीन कमरों में तीन सौ से अधिक बच्चे बैठकर पढ़ते हैं। बच्चों को टॉफी, फल व दूध भी दिया जाता है। प्रधानाध्यापक का कहना है कि तीन से चार हजार रुपये वह अपने वेतन से खर्च करती हैं। उससे अधिक खर्चा आने पर सहयोगी अध्यापकों से सहयोग ले लेती हैं। इस बार करीब 100 बच्चों का दाखिला स्कूल में नहीं हो सका। उसके लिए बहुत सिफारिश आईं लेकिन, उसे अनसुना कर दिया गया।

बीएसए हरिहर प्रसाद ने बताया कि बेहतर शिक्षण से बच्चों की संख्या अधिक हैं। उसके सापेक्ष कक्ष की कमी है। सिफारिश के बावजूद भी नामांकन करना मुश्किल हो रहा है। फिर भी दाखिला करने का निर्देश दिया गया है।रमन मिश्र’बलरामपुर1परिषदीय विद्यालयों में बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए अफसर से लेकर जनप्रतिनिधि तक एड़ी से चोटी तक का जोर लगाने के बाद भी स्कूलों में बच्चों की संख्या नहीं बढ़ा पा रहे हैं। वही सदर शिक्षा क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालय द्वितीय में दाखिला कराने के लिए अभिभावकों को जनप्रतिनिधियों से लेकर अफसरों तक से सिफारिशें करानी पड़ती हैं। बावजूद इसके बच्चों का दाखिला नहीं हो पाता है। बच्चों को संस्कार के साथ पर्यावरण, जलसंरक्षण व स्वच्छता की सीख दी जाती है।

ऐसे बदली सूरत 1वर्ष 2013 में प्रधानाध्यापक अनीता कुशवाहा की तैनाती हुई। उस समय विद्यालय में महज 129 छात्र नामांकित थे, लेकिन 70 से 90 बच्चों की उपस्थिति रहती थी। दो शिक्षामित्रों की तैनाती थी। उनका भी समायोजन हो गया, जिससे वह अकेले हो गईं। घर-घर जाकर अभिभावकों को जागरूक किया। बच्चों की संख्या बढ़कर 310 हो गई। इसके बाद सहायक अध्यापिका निहारिका सिंह, सौम्या सिंह, प्रज्ञा गोस्वामी व यास्मीन परवीन की तैनाती हुई। वर्ष 2014 में स्कूल को मॉडल स्कूल का दर्जा मिल गया। प्रोजेक्टर, बोर्ड, माइक, शौचालय, खिलौने, झूले व वाश बेसिन टंकी, रंग-रोगन कराया। बच्चों को बैठने के लिए कारपेट बिछवाया। 2016 में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने उत्कृष्ट विद्यालय के पुरस्कार से पुरस्कृत किया। आज तीन कमरों में तीन सौ से अधिक बच्चे बैठकर पढ़ते हैं। बच्चों को टॉफी, फल व दूध भी दिया जाता है। प्रधानाध्यापक का कहना है कि तीन से चार हजार रुपये वह अपने वेतन से खर्च करती हैं। उससे अधिक खर्चा आने पर सहयोगी अध्यापकों से सहयोग ले लेती हैं। इस बार करीब 100 बच्चों का दाखिला स्कूल में नहीं हो सका। उसके लिए बहुत सिफारिश आईं लेकिन, उसे अनसुना कर दिया गया।

बीएसए हरिहर प्रसाद ने बताया कि बेहतर शिक्षण से बच्चों की संख्या अधिक हैं। उसके सापेक्ष कक्ष की कमी है। सिफारिश के बावजूद भी नामांकन करना मुश्किल हो रहा है। फिर भी दाखिला करने का निर्देश दिया गया है।सदर शिक्षा क्षेत्र स्थित प्राथमिक विद्यालय खगईजोत द्वितीय में छात्रों को पढ़ाती सहायक अध्यापक प्रज्ञा गोस्वामी और द्वितीय मे बेंच पर पढ़ाई करते छात्र ’जागरणसदर शिक्षा क्षेत्र स्थित प्राथमिक विद्यालय खगईजोत द्वितीय में बनाई गई पेंटिंगप्रधानाध्यापक अनीता कुशवाहा


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July 25, 2018

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