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नवंबर 06, 2015

आरक्षण : इतिहास, कारण, और राजनीति, पढ़ें पूरा लेख

देश में एक बार फिर आरक्षण का मुद्दा सिर उठाए खड़ा है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस बार यह चिंगारी गुजरात में जली है। उस गुजरात में जिसे कुछ समय पहले तक विकास के सफल मॉडल के रूप में पेश किया जा रहा था। गुजरात में युवक हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पटेल समुदाय आरक्षण की मांग कर रहा है। पूरा पटेल समुदाय सड़कों पर उतर आया है।

 जिसके कारण राज्य में कई जगह हिंसक घटनाएं भी हुई। सरकारी संपत्ति को नुकसान भी पहुंचाया गया। कुछ जगहों पर कर्फ्यू भी लगा तथा अहमदाबाद सहित कई जगहों पर इंटरनेट सेवा भी बंद कर दी गई। यह सब उस गुजरात में हो रहा है जिसकी समृद्धि और विकास मॉडल का उदाहरण पूरे विश्व में दिया जा रहा था। लेकिन आज इस राज्य की हालत देख दया आती है कि यहां राजनैतिक व आर्थिक रूप में सबसे ताकतवर पटेल समुदाय आज इस तरह सड़कों पर उतरकर आरक्षण की मांग कर रहा है।

 माना की हमारे देश में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का पूरा हक है साथ ही गुजरात के पटेल समुदाय की आरक्षण की मांग कितनी उचित है, इस पर बहस की गुंजाइश भी है। लेकिन अपनी मांग रखने का जो तरीका उन्होंने अपनाया है वह कहां तक सही है आखिर आप इस तरह के हिंसक प्रदर्शन करके क्या साबित करना चाहते हैं ? लेकिन पटेलों ने आरक्षण को लेकर जिस प्रकार का उग्र रूपधारण किया है उससे आऱक्षण का मुद्दा एक बार फिर सतह पर आ गया है। शायद गुर्जर आंदोलन भी लोगों के ज़हन से अभी तक नहीं उतरा होगा।

पटेल अपनी इस मांग के पीछे यह तर्क दे रहे है कि पटेल उम्मीदवार को 90 प्रतिशत अंक आने के बाद भी उसे एमबीबीएम कॉलेजों में प्रवेश नहीं मिल पाता वहीं आरक्षण प्राप्त उम्मीदवार केवल 45 प्रतिशत अंक प्राप्त कर प्रवेश पा लेते हैं। हालांकि पटेलों का यह तर्क पूरे देश में आरक्षण से बाहर जातियों की कुंठा और पीड़ा का कुछ हद तक चित्रण जरूर करता है।

इस पटेल आंदोलन से कहीं न कहीं यह संदेश जरूर जाता है कि शायद अब वक्त आ गया है कि देश से आरक्षण को खत्म कर दिया जाए क्योंकि इस बात को कोई नहीं झूठला सकते कि आज आरक्षण सिर्फ एक राजनैतिक हथियार के अलावा और कुछ नहीं रह गया तथा ज्यादातर जातियों को पता है कि इसे जन बल के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। कुछ समय पहले राजस्थान में जाट आरक्षण की मांग रद्द करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि पिछड़ेपन की पहचान आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षणिकता को ध्यान में रखकर करना चाहिए न की जाति के पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए। सर्वोच्च न्यायालय की बात शत् प्रतिशत सही भी है और अब आरक्षण की समीक्षा होना बहुत जरूरी है क्योंकि हकीकत में जिन जातियों को इसका लाभ मिलना चाहिए उन तक इसका लाभ नहीं पहुंच पा रहा है।

आज आए दिन देश के किसी न किसी कोने से आरक्षण की मांग उठती ही रहती है। जबकि आरक्षण की व्यवस्था आजादी के सिर्फ दस साल बाद तक थी। लेकिन सिर्फ अपना वोट बैंक खोने के डर से किसी भी सरकार ने इसे खत्म करने या इसकी समीक्षा करने की कोशिश नहीं की।

हमारे देश के संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर भी देश में सदा के लिए आरक्षण जारी रखने के पक्ष में नहीं थे। अगस्त 1949 में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का समर्थन करते हुए भीमराव अंबेडकर, पं जवाहर लाल नेहरू आदि सभी नेताओं ने इसे 10 साल बाद खत्म करने की सिफारिश की थी। 

देश के सबसे बड़े दलित नेता अंबेडकर बड़े दूरदर्शी थे उन्होंने कहा था कि यह आरक्षण कुछ अपवादों को छोड़कर सिर्फ गरीबी, पिछडेपन, सामाजिक भेदभाव, अकुशलता आदि को ही जन्म देगा। यह देश के विकास में एक दिन रोड़ा बनकर खड़ा होगा। 

आज के संदर्भ में देखे तो यह बात बिल्कुल सही साबित होती है। नेहरू जी ने भी 1961 में सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख आरक्षण का विरोध किया था। लेकिन इसके बाद भी आज आरक्षण जारी है। हालांकि यह बात सच है कि आरक्षण से कई प्रतिभाएं उभर कर सामने आई लेकिन इस सत्य को भी कोई नहीं झुठला सकता की उससे कहीं अधिक प्रतिभाएं ने आरक्षण के कारण ही अंधेरी गलियों में दम तोड़ दिया। 

इस आरक्षण की वजह से ही साल दर साल देश की हालत बिगड़ती रही लेकिन भारतीय राजनैतिक पार्टियों अपने मतलब की रोटियां सेकती रही। आज हालात यह है कि कई राज्यों में आरक्षण 50 प्रतिशत से भी अधिक है। हालात यह है अब पार्टियां जातियों के बाद धर्म के नाम पर आरक्षण देने का खेल खेल रही हैं। जिसका उदाहरण हमने पिछली यूपीए सरकार के दौरान देखा जिसने रागनाथन मिश्र आयोग का गठन कर यह सिफारिश की कि अल्पसंख्यकों को सरकारी नौकरियों में 15 प्रतिशत का आरक्षण होना चाहिए।

 संक्षिप्त रूप में हम कहे तो आरक्षण आज सिर्फ देश को पीछे धकेलने और राजनैतिक पार्टियों का हथियार बनकर रह गया है। यह परिस्तिथियों की मांग है कि आरक्षण की समीक्षा होना ही चाहिए। तथा जाति के आधार पर आरक्षण पूर्णरूप से खत्म होना चाहिए। वरना कभी राजस्थान तो कभी गुजरात जैसी घटनाएं देश में प्रतिवर्ष होती ही रहेंगी।

आरक्षण : इतिहास, कारण, और राजनीति, पढ़ें पूरा लेख Rating: 4.5 Diposkan Oleh: Kamal Singh Kripal

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