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अक्तूबर 03, 2015

गांधी के बाद अंबेडकर भारत के सबसे पूजनीय नेता' पढ़ें बीबीसी द्वारा जारी रिपोर्ट |

सौतिक बिस्वास शुक्रवार,संवाददाता | हर कस्बे में अंबेडकर की मूर्तियां वो हिंदुस्तान के बड़े नेताओं में से एक थे। दुनिया के संभवतः सबसे बड़े संविधान के शिल्पी, कानून के बड़े विद्वान, एक आध्यत्मिक नेता, एक योजनाकार और सबसे अहम, उन दलितों के निर्विवादित नेता, जिनकी जगह भारत की कड़वी जातीय व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर है। महात्मा गांधी के बाद भीमराव रामजी आंबेडकर भारत के निःसंदेह सबसे पूजनीय नेता थे। उनकी मूर्ति हर कस्बे, गाँव, शहर, चौराहे, रेलवे स्टेशन और पार्कों में भारी संख्या में लगी है।

इस करिश्माई नेता को आमतौर पर पश्चिमी सूट और टाई के साथ सामने वाली जेब में एक कलम और बांहों में भारतीय संविधान की किताब लिए और चश्मा लगाए एक गठीले इंसान के रूप में चित्रित किया जाता है। इतिहासविद् जानकी नायर के मुताबिक, “यह दलितों की दावेदारी का प्रतीक है।” इसमें हैरानी की बात नहीं है कि ऊंच नीच और जाति व्यवस्था वाले भारत में आंबेडकर अछूत के रूप में जाने जाने वाले दलितों और उनके विरोधियों के लिए एक मिसाल हैं। शायद इसीलिए कई राज्यों में प्रशासन इस नेता की मूर्तियों के चारों ओर पिंजरा बनवा रहा है।

ये वही नेता हैं जिन्हें इतिहासविद रामचंद्र गुहा गरीबों का मसीहा कहते हैं। भारत के सबसे विकसित राज्यों में से एक तमिलनाडु में यह समस्या सामने आई है। इस राज्य की अर्थव्यवस्था भारत में दूसरे नंबर की है और विश्व बैंक के मुताबिक, मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स के लक्ष्यों को पाने के हिसाब से यह राज्य समय पर चल रहा है। इस राज्य में दशकों तक तार्किक और जाति विरोध की राजनीति करने वाली पार्टियों ने राज किया है और इस समय वो मुख्य विपक्षी पार्टी हैं।

स्याह पहलू :-

 पूरे राज्य की आबादी में 19 प्रतिशत दलित हैं। अपने हक को लेकर दलितों की दावेदारी के विरोधी, सालों से हिंसा और दंगा भड़काने के लिए आंबेडकर की मूर्ति को चप्पलों की माला पहनाकर या उनके हाथ काटकर अपमानित करते रहे हैं। दबंग जातियों पर काबू पाने में विफल रहने वाला भयभीत प्रशासन पूरे राज्य में स्थापित इन मूर्तियों के चारों ओर पिंजरा बनवा रहा है। राजनीतिक विज्ञान के विद्वान सी लक्ष्मण कहते हैं, “यह तमिलनाडु के लिए सबसे बड़ी शर्मिंदगी है। यह दिखाता है कि दलितों की सुरक्षा करने में राज्य पूरी तरह असफल हो चुका है। राज्य जातिगत बर्बरता के सामने दिनों दिन घुटने टेकता जा रहा है।” दलितों का विरोध इतना तगड़ा और खुलेआम है कि उन पर अत्याचार के खिलाफ बने कानून को ढीला करने की मांग को लेकर ऊंची जातियों के समूहों ने सार्वजनिक रूप से हाथ मिला लिए हैं। लक्ष्मण इसे साफ तौर पर ‘दलित विरोधी राजनीति’ कहते
हैं और यह इसी का एक नमूना है।अतीत में भी दबंग जातियों ने आंबेडकर के नाम वाली राज्य की सरकारी बसों को अपने गांवों में घुसने से रोक दिया था और प्रशासन को नाम हटाने पर मजबूर किया था। मेरे गांव में दलितों को अब भी सामुदायिक कुंओं के इस्तेमाल की इजाजत नहीं है, न ही हिंदू मंदिरों में घुसने और नाई की दुकान में जाने की इजाजत है।

‘जातीय फासीवाद’ :-

पिछले साल तमिलनाडु में भीड़ के हमले और आपसी भिड़ंत में बिहार के 70 गरीब दलित मारे गए थे। वर्ष 1956 से अब तक राज्य में दलितों के खिलाफ अपराध की घटनाओं में कम से कम 15 न्यायिक जांच चल रही है लेकिन एक भी अभियुक्त को सजा नहीं हुई है। घोर जाति विरोधी पार्टी वीसीके (लिबरेशन पैंथर्स पार्टी) के नेता और विधायक एन रविकुमार कहते हैं, “दबंग जातियों में दिनों दिन तनाव बढ़ता जा रहा है। इसलिए दबंग जातियां दलितों के खिलाफ अपना गुस्सा उतार रही हैं।” अंबेडकर की मूर्तियों को पिंजड़े में बंद करने की कार्रवाई को राज्य में बहुत से लोग आज के भारत में ‘जातीय फासीवाद’ एक उदाहरण मानते हैं।

 इससे यह भी सिद्ध होता है कि देश की जाति आधारित पार्टियां समाज में इंसाफ और अधिकारों के लिए लड़ने की बजाय अपने अपने जातीय समूहों के हित में विशेष लाभ और रियायतें लेने की फिराक में रहती हैं। इसलिए सबसे बुरे और घिनौने रूप में अछूत समस्या तमिलनाडु में न केवल जिंदा है बल्कि मजबूत है। अपने एक ऐतिहासिक भाषण में आंबेडकर ने हैरानी जताई थी कि सामाजिक और आर्थिक घेरे में भारतीय कितने लंबे समय तक बराबरी देने से इनकार करते रहेंगे।

उन्होंने कहा था, “अगर हम बराबरी का अधिकार देने में बहुत देरी करते रहे, तो ऐसा केवल राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डालकर ही कर पाते हैं।” उन्होंने कहा था कि आजाद भारत का अधिकांश विकास गोबर के ढेर पर जाति के निर्माण जैसा है। बहुत से लोग इसे कड़वा लेकिन दूरदर्शी सच्चाई मानते हैं।

न्यूज़ साभार : बीबीसी 2 अक्टूबर 2015

गांधी के बाद अंबेडकर भारत के सबसे पूजनीय नेता' पढ़ें बीबीसी द्वारा जारी रिपोर्ट | Rating: 4.5 Diposkan Oleh: Kamal Singh Kripal

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