बेसिक शिक्षा परिषद के अंतर्गत विद्यालयों के लिए वर्ष 2018 की आधिकारिक अवकाश तालिका जारी : Download Official Holiday List

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सितंबर 14, 2015

हिंदी दिवस स्पेशल :अंग्रेजी को बढ़ावा देने की नीति में बदलाव कर,पहले हिंदी को शिक्षा का माध्यम तो बनाएं,बिना इसके राष्ट्रभाषा की बातें मात्र कोरी कल्पना

गोविंद सिंह, प्रोफेसर उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह, हिंदी पखवाड़ा, हिंदी मास। यानी सरकारी कामकाज में हिंदी लागू करने-कराने का अभियान। इस अभियान के तहत हम अक्सर उन नौकरशाहों को जी भरकर कोसते हैं, जो हिंदी को सरकारी फाइलों में नहीं घुसने देते, जो सरकारी चिट्ठियों में हिंदी नहीं
लिखने देते। हम उस सरकारी व्यवस्था को भी कोसने से नहीं चूकते, जो हर साल हिंदी लागू करने के फर्जी आंकड़े पेश करवाती है और सरकार के पास यह रिपोर्ट भेजती है कि हिंदी अब 99 फीसदी तक आ चुकी है, जबकि सच्चाई यह होती है कि हिंदी वहीं की वहीं होती है। हम फिजूल ही नौकरशाहों को कोसते हैं। हम उनसे यह अपेक्षा रखते हैं कि वे मरियल पौधों के फूलों को सींचें और पूरी फुलवारी लहलहा उठे।

 असल चुनौती है जड़ों को सींचने की। और जड़ों  में पानी डालने की सख्त मनाही है। सरकार, नेता, राजनीतिक दल, शिक्षक, नौकरशाह और समूचे तौर पर हमारा समाज इस गुपचुप अभियान में शामिल है कि जड़ों को न सींचा जाए। आप राजभाषा के तौर पर हिंदी को लागू करने के लाख जतन कर लीजिए, जब तक आप शिक्षा में अंग्रेजी को बढ़ावा देने की नीति को नहीं बदलते, तब तक कुछ नहीं होने वाला। आप लाख विश्व हिंदी सम्मलेन कर लें, उसे संयुक्त राष्ट्र की भाषा बना डालें, जब तक अपने नौनिहालों के मन से हिंदी के प्रति घृणा को नहीं निकाल देंगे, तब तक कोई लाभ नहीं होने वाला।

 हम एक तरफ बच्चों को जबरन अंग्रेजी बोलने, लिखने और उसी में अपने सपने देखने को कहते हैं, और दूसरी तरफ उन्हीं स्कूलों-कॉलेजों से पढ़कर ऊंचे पदों पर बैठे अफसरों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे अंग्रेजी छोड़कर हिंदी को अपनाएं। जब मैं बच्चा था, मेरे जिले में एक भी अंग्रेजी माध्यम का स्कूल नहीं था। अमीर-गरीब, सबके बच्चे हिंदी माध्यम की सामान शिक्षा ग्रहण करते थे। आज उस जिले के दो जिले हो गए हैं और अकेले मेरे जिले में ही तथाकथित 500 अंग्रेजी स्कूल खुल गए हैं। वे अंग्रेजी सिखा रहे हों या नहीं, मगर इतना तय है कि हिंदी से दूर रहने की हिदायत जरूर देते हैं। हम यह नहीं कहते कि हिंदी नहीं बढ़ रही। वह भी बढ़ रही है, लेकिन अंग्रेजी उससे दस गुना तेज रफ्तार से बढ़ रही है।

 आजादी के समय यह कहा गया था कि दस साल के भीतर हिंदी में अनुवाद की सारी व्यवस्था कर ली जाए। विज्ञान और इंजीनियरिंग की किताबों को हिंदी में कर लिया जाए। लेकिन 1950 के दशक में हिंदी माध्यम की जो किताबें थीं भी, वे भी गायब हो गईं। जिन राज्यों में छठी कक्षा से अंग्रेजी लागू होती थी, उन्हें भी लगा कि उनके बच्चे पिछड़ रहे हैं। वहां भी पहली कक्षा से ही अंग्रेजी लागू होने लगी। उच्च शिक्षा तो दूर, प्राथमिक स्कूलों से ही हिंदी-माध्यम गायब होता जा रहा है। हम चाहे लाख विश्व हिंदी सम्मलेन आयोजित कर लें, जब तक शिक्षा से हिंदी को दूर रखेंगे, तब तक कोई लाभ होने वाला नहीं है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

हिंदी दिवस स्पेशल :अंग्रेजी को बढ़ावा देने की नीति में बदलाव कर,पहले हिंदी को शिक्षा का माध्यम तो बनाएं,बिना इसके राष्ट्रभाषा की बातें मात्र कोरी कल्पना Rating: 4.5 Diposkan Oleh: Kamal Singh Kripal

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