बेसिक शिक्षा परिषद के अंतर्गत विद्यालयों के लिए वर्ष 2018 की आधिकारिक अवकाश तालिका जारी : Download Official Holiday List

बेसिक शिक्षा परिषद के अंतर्गत विद्यालयों के लिए वर्ष 2018 की आधिकारिक अवकाश तालिका जारी : Download Official Holiday List

अगस्त 28, 2015

अभिनंदन ग्रंथ के युग में खरे स्वर की याद : हिंदी साहित्य पर आलेख पढ़ें ।

आज अगर हिंदी साहित्य के परिदृश्य में एक अजीब तरह का ठंडापन और वैचारिक सन्नाटा-सा है, तो इसमें हंस के संपादक व कथाकार राजेंद्र यादव की कमी और शिद्दत से महसूस होती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि राजेंद्र यादव हिंदी के संभवत: आखिरी सार्वजनिक बुद्धिजीवी थे। साहित्य के अलावा सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर उनकी स्पष्ट राय होती थी, जो वह प्रकट भी करते थे। इस बात की परवाह किए बगैर कि उसका अंजाम क्या होगा अपनी टिप्पणियों की वजह से उनको कई रातें पुलिस सुरक्षा में गुजारनी पड़ी थीं। दूसरी बात जिसकी कमी आज महसूस होती है, वह है एक सक्रिय साहित्यक संपादक की। राजेंद्र जी के वक्त हंस में एक धार और तेवर साफ तौर पर दिखता था। वह लगातार लेखकों के संपर्क में रहते थे, नए और पुराने। उनको उकसाते भी रहते थे। उकसाते थे लेखन के लिए, तमाम सवालों से मुठभेड़ करने के लिए। शायद इसीलिए उनके विरोधी और प्रशंसक, दोनों उनको विवादाचार्य कहा करते थे। राजेंद्र यादव एक और बात कहा करते थे- साहित्य स्पॉन्टेनियटी (स्वत:स्फूर्त) का खेल है, स्पॉन्सरशिप का नहीं।

उनकी पत्रिका हंस में भी स्पॉन्टेनियटी और स्पॉन्सरशिप का खेल दिखता था, पर उसका अनुपात दाल में नमक की तरह होता था। इन दिनों तो स्पॉन्टेनियटी पर पूरी तरह से स्पॉन्सरशिप साहित्य जगत में हावी हो गई है, नमक में दाल की तरह। लेखकों पर मोटे- मोटे अंक प्रकाशित हो रहे हैं, जो लगभग अभिनंदन ग्रंथ की तरह हैं, भक्तिभाव से सराबोर। आप हमें पुरस्कार दो, हम आपको सम्मानित करेंगे। आप सेमिनार में हमें बुलाओ, हम गोष्ठियों में आपको आमंत्रित करेंगे। सभी जानते हैं कि ये खेल खूब चल रहा है, लेकिन कोई भी लेखक इन पर कुछ लिखता नहीं है। राजेंद्र यादव होते, तो कम से कम अपने संपादकीय में इसका जोरदार विरोध अवश्य करते। इन दिनों वरिष्ठ साहित्यकारों ने जिस तरह से साहित्यिक और सामाजिक मुद्दों पर खामोशी अख्तियार कर ली है, वह पूरे साहित्य जगत के लिए अच्छा संकेत नहीं है। राजेंद्र यादव के संपादकत्व के दौर की हं को देखें, तो इस वक्त की हंस में उनका न होना साफ दिख जाता है। यादव जी हमेशा आलोचनानुमा बोझिल लेखों के खिलाफ थे। वह अपने खिलंदड़े अंदाज में कहा करते थे कि यार, बहुत ज्ञान दे दिया है, इतना बर्दाश्त नहीं हो रहा है। वह खुद तो नई से नई किताबों के बारे में जानने को उत्सुक रहते ही थे, हिंदी के पाठकों तक उस जानकारी कोनपहुंचाने के लिए सजग और प्रयत्नशील रहा करते थे। किसी भी नई किताब की चर्चा करते ही वह एकदम बच्चे की तरह जिद पर उतारू हो जाते थे कि आज ही भेजो, आज ही खरीदो। आज राजेंद्र यादव की 86वीं जन्मतिथि पर हमारे पास उनकी ऐसी यादें ही हैं, जो बहुत कुछ बताती और सिखाती हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

अभिनंदन ग्रंथ के युग में खरे स्वर की याद : हिंदी साहित्य पर आलेख पढ़ें । Rating: 4.5 Diposkan Oleh: Kamal Singh Kripal

वैधानिक चेतावनी

इस ब्लॉग/वेबसाइट की सभी खबरें व शासनादेश सोशल मीडिया से ली गई हैं । कृपया खबरों / शासनादेशों का प्रयोग करने से पहले वैधानिक पुष्टि अवश्य कर लें | इसमें ब्लॉग एडमिन की कोई जिम्मेदारी नहीं है | पाठक खबरों के प्रयोग हेतु खुद जिम्मेदार होगा | किसी भी वाद - विवाद की स्थिति में उच्च न्यायालय इलाहाबाद का अंतिम निर्णय मान्य होगा ।